Monday, April 6, 2020

दर्पण झूठ नहीं बोलता

दर्पण झूठ नहीं बोलता             

मित्रो, वरिष्ठ कवि डॉ कुँवर बेचैन का नाम आप सबने सुना होगा । आइए, उनकी एक बेहतरीन कविता के साथ आज का सफर शुरू करें :
                        अपनी सियाह पीठ छुपाता है आईना ।
                        सबको हमारे दाग दिखाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        इसका न कोई दीन, न ईमान, न धरम –
                        इस हाथ से उस हाथ में जाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        खाई ज़रा सी चोट तो टुकड़ों में बंट गया
                        हमको भी अपनी शक्ल में लाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        हम टूट भी गए तो ये बोला न एक बार
                        जब खुद गिरा तो शोर मचाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        हर पल नहा रहा है हमारे ही खून से-
                        पानी से अब कहाँ ये नहाता है आईना ?
                                                                                                                         
                        सजने के वक़्त भी ये हमें दे गया खरोंच-
                        बस नाम का ही भाग्य विधाता है आईना ।

दिन भर में जिन जरूरी वस्तुओं का हम उपयोग करते हैं उनमें से एक दर्पण भी है । सुबह उठने से रात सोने तक हम कई बार दर्पण में अपनी सूरत निहार ही लेते हैं, और कई लोग होते हैं जो दर्पण के सामने खड़े होकर कोई अभ्यास करते हैं और इसका महत्व समझते हैं । इसे जरा जिंदगी से जोड़ कर देखिए । दर्पण सिर्फ दिखाता है या बताता है उसके आगे और बाद ठीक करने की ज़िम्मेदारी हम निभाते हैं । दर्पण का वैसे सबसे ज्यादा इशारा सूरत पर होता है कि आप कितना सज-संवरकर सहज महसूस करेंगे । स्त्रियों में सजने-सँवरने के लिए दर्पण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । उनका श्रृंगार दर्पण बिना अधूरा ही होता है । फिल्म उपासना में इंदीवर की कलम से निकले और मुकेश की पुरकशिश आवाज़ में यह गीत यही कुछ तो कह रहा है :   

            वैसे दर्पण यदि बड़े नाप का हो  तो आपके पहने लिबास के साथ आपको तैयार दिखाने में मददगार साबित होता है , और एक बात, जिसे हम सब देख नजर अंदाज करने की कोशिश करते हैं, छुपाने की कोशिश करते हैं या फिर ‘जाने दो’ वाले आलम में दर्पण को अलविदा कह कर मुड़ जाते हैं; वह है आपके शरीर की बनावट जो बेडौल हो तो आप उस ओर ध्यान ही नहीं देना चाहते । मशहूर शायर कृष्ण बिहारी “नूर” फरमाते हैं :
                        “आईना यह तो बताता है कि मैं क्या हूं मगर
                        आईना इस पर है खामोश की क्या है मुझ में ?”
गीत गाता चल फिल्म में ये गीत भी ऐसा ही कुछ कह रहा है :

            क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि दर्पण आपका एक गुप्त साथी भी है जो आपको आपकी सच्चाई दिखाता है । आपका अभ्यास करवाता है, आपको अक्स दिखाकर समझाइश देता है । उदाहरण के लिए देखिए यदि आपको उच्चारण का अभ्यास करना हो तो दर्पण के सामने आप पूरी तरह खुल कर बोलिए । वह आप पर कभी नहीं हंसेगा । हम अक्सर एकांत में ही दर्पण देखना पसंद करते हैं इसका कारण शायद यही है कि हम खुलकर दर्पण के सामने एकांत में उससे बात कर लेते हैं अपने मन की बात कह लेते हैं । आईने के सामने हम अपने अतीत को खोजने लगते हैं :  

            दर्पण की खासियत देखिए ना जो भी उसके सामने आता है जैसा भी चला आता है ,वह उसका सहर्ष स्वागत करता है बिना किसी भेदभाव के, सभी के लिए समान भाव होता है दर्पण में, लेकिन किसी का अक्स वह छुपा कर नहीं रख सकता आप दर्पण से दूर हुए आपकी छवि भी ओझल हो जाती है।  यह क्षणभंगुर सा  स्वभाव दर्पण का कितना निश्चल कितना अपना सा लगता है हर व्यक्ति को अपने आप से प्रेम होता है अपने विचार, व्यवहार, शक्ल पर नाज होता है और वह अपने आप को उत्तम समझता है, दूसरों में कमी ढूंढता है यह मानव स्वभाव है । ऐसे में यदि दर्पण का सभी का मुख हो जाए तो जहां भी आप देखेंगे आप ही आप नजर आएंगे । मेरे कहने का अर्थ यह है कि क्यों ना हम सारे पहन ले आईने सारे देखेंगे अपना ही चेहरा सबको सारे हंसी लगेंगे यहां ।

            आईना की बड़ी खासियत है कि यह नेगेटिव और पॉजिटिव एनर्जी दोनों को अपनी ओर खींचता है लेकिन ठीक इसी तरह यह दोनों पॉजिटिव और नेगेटिव को रिफ्लैक्ट कर देता है मतलब यह आईने के सामने जैसे नजर जाएगी वह वैसे ही एनर्जी रिफ्लक्स करेगा । यही कारण है कि वास्तु दोष दूर करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है इसका प्रयोग इमारतों, घरों ,होटलों ,दुकानों में बड़े पैमाने पर किया जाता है सजावट के तौर पर, रोशनी के लिए चमकदार रिफ्लेक्शन के लिए, कोई चीज बड़ी दिखाने के लिए, सजावट के लिए, पर हां, इसकी अपनी कोई रोशनी नहीं होती इसके परावर्तन के लिए रोशनी के स्रोत की आवश्यकता जरूर पड़ती है । ये गीत भी कुछ कह रहा है :  

जरा सोचिए कांच का आविष्कार कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हमारी जिंदगी में । भले ही आज एलईडी का जमाना है । यदि कांच ना बनता तो पहले साधारण बल्ब और ट्यूबलाइट इस कांच के बगैर अधूरे होते ,बेकार होते ।  यदि कांच ना होता तो दर्पण कैसे अस्तित्व में आता ? नजर से कमजोर लोगों का क्या होता ? विभिन्न प्रकार के लेंस ना बन पाते तो क्या होता ? पारदर्शी वस्तु के निर्माण जैसे की खिड़की के कांच रोशनदान का क्या होता ? टीवी कंप्यूटर आपके मोबाइल का क्या होता जिसके बिना एक पल भी नहीं रहना चाहते । यदि शीशा टूटा तो किरचा  किरचा  इसका घाव  करेगा । फिल्म आशा के इस गीत को सुन कर ऐसा ही तो महसूस होता है  :
            विज्ञान की साधारण भाषा में दर्पण एक प्रकाश युक्ति है जो प्रकाश के परावर्तन के सिद्धांत पर काम करती है । इसका प्रयोग हम मुख्यतः अपनी छवि देखने के लिए करते हैं । इसके अलावा प्रकाश यंत्र, दूरदर्शी यंत्र या फिर सूक्ष्मदर्शी यंत्र के रूप में भी करते हैं और या फिर प्रकाश को एक बिंदु पर केंद्रित करने के लिए भी करते हैं । कैलिफोर्निया निवासी हिन्दी कवयित्री अर्चना पांडा (kavitaprayas.blogspot.com)  ने क्या खूब कहा है :  
                        प्रेम प्यार की समझ ना मुझको पूर्ण समर्पण हूं मैं ।
                        तू जो चाहे वही दिखाऊँ ऐसा दर्पण हूं मैं ।
इसी ज़मीन पर किसी शायर ने ये भी कह दिया है :
                        आईना कुछ नहीं नजर का धोखा है ।
                        नजर वही आता है जो दिल में होता है ।
फिल्म आरोप का ये गीत सुनिए :

            राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता की पंक्तियां हैं
                        जा रही देवता से मिलने तो इतनी कृपा किए जाओ ,
                        अपने फूलों की डाली में दर्पण यह एक लिए जाओ ,
                        आरती फूल से प्रसन्न जैसे हो पहले कर लेना,
                        जब हाल धरित्री का पूछे सम्मुख दर्पण रख  देना
            कहते हैं आईना सच बोलता है, वह दिखाता है जो होता है क्योंकि दर्पण झूठ नहीं सच बोलता है । किसी शायर ने कहा है :
                        किरदार अपना पहले बनाने की बात कर, ।  
                        फिर आईना किसी को बनाने की बात कर ।  
फिल्म नई उम्र की नई फसल का ये गीत कुछ कह जाता है :

            दर्पण का वैज्ञानिक प्रयोग कितना कारगर है, इसका अंदाजा साधारण व्यक्ति शायद पूरी तरह नहीं लगा सकता पर ,फिर भी निजी जिंदगी में सोलर कुकर जो हम इस्तेमाल करते हैं या फिर माइक्रोस्कोप जो इस्तेमाल किया जाता है और सबसे अहम ड्राइविंग में जो हम इस्तेमाल करते हैं इन सब का आपको तो अंदाज़ा  होगा ना ? समुद्री यात्रा हो, पर्वतारोहण करना हो तो इस दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले दूरबीन  कितने जरूरी हैं आप जानते ही हैं । तो दर्पण का प्रयोग दैनिक जीवन में केवल सूरत देखने में नहीं बल्कि कई उपयोग में होता है । फिल्म जीवन धारा का यह गीत एक संदेश देता है :  

            दर्पण की बात है तो उस भौतिक दर्पण के अलावा एक और दर्पण की बात आपसे जरूर करेंगे जो आपके अपने शुभचिंतक आप को दिखाना चाहते हैं, जिसकी ओर वह संकेत देते हैं और वह आप पर निर्भर करता है कि वह इशारा आप समझ कर कैसे सही बन पाते हैं ? यह शुभचिंतक आपके अपने गुरुजन हो सकते हैं , मित्र हो सकते हैं , माता-पिता या कोई भी हो सकता है , जीवन रूपी दर्पण आपके व्यक्तित्व का निखार बढ़ा सकते हैं, वह माद्दा रखते हैं जो आपके व्यक्तित्व के साथ भूमिका को भी बदल दे । ख़ुमार बाराबंकवी कहते हैं :
                                    दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए ।
                                    सामने आइना रख लिया कीजिए ।
आइये ! अपने किरदार को आईने जैसा साफ और बेदाग बनाएँ । फिल्म काजल का ये गीत आप सभी पाठकों को समर्पित है :

            जल्दी ही फिर मिलते हैं – नए विषय और मधुर गीतों के साथ -! नमस्कार ।
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डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है  । इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है  । अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी । गीतों की लिंक youtube से साभार ।
© neetika verma नीतिका वर्मा
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Friday, March 27, 2020

सूरत और सीरत


सूरत और सीरत

            दोस्तो ! आज कुछ बातें करते हैं सूरत और सीरत की और साथ ही सुनते हैं कुछ मधुर गीत :
            माना 'अच्छी सूरत' भी ज़रूरी है, पर बिन 'सीरत' यह 'सूरत' किस काम की ? सूरत का क्या, आज जवां है कल मुरझा जाएगी । परसों मिट्टी में मिल जाएगी । याद तो हर जगह बस तेरी सीरत ही आएगी  ।
            सूरत व्यक्तित्व का वो पहलू है जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, सीरत व्यक्तित्व का वो हिस्सा है जो सामने तो नहीं पर व्यवहार से झलकता है । इसलिए अगर किसी का समग्र मूल्यांकन करना हो तो सूरत और सीरत का समुचित मूल्यांकन करना होगा  । इसलिए दिखावे बनावटी तौर पर आप कुछ भी दिखाये, पर आपका व्यवहार  सीरत का  असली हाल उजागर कर देता है । ये गीत भी तो कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है ।
जब आप किसी अजनबी अंजान व्यक्ति से मिलते हैं, उसका चेहरा आप  पहले देखकर  मूल्यांकन करने की कोशिश करते हैं , उसकी भाव-भंगिमाएँ आपको सहज या असहज बनाती हैं ।फिर उससे बात  करने के बाद आप उसका पूरा चरित्र तो नहीं समझ पाते पर, उसका व्यवहार आपके अनुरूप था या नहीं के हिसाब से आप उस व्यक्ति की एक छवि अपने मन में बना लेते हैं । ऐसा हमारे साथ कई बार हुआ है, तो फिर आप क्या याद रखते हैं उस व्यक्ति की शक्ल या उस व्यक्ति का व्यवहार यानि उसकी सीरत?
सीरत ऐसा हुनर है जो आपके लिए दूसरे के दिल में जगह बना लेता है और जब आप दिल में बस जाते हैं तो आप उनको अपनों से लगने लगते हैं  । किसी शायर ने क्या खूब कहा है –
                       “सिर्फ सीरत ने जीता है हर एक दिल को
                        बस थोड़ा सा वक्त का तक़ाज़ा चाहिए” । 
सुनिए ये गीत,
दोस्तो, जीवन में सफलता और लोकप्रियता के लिए आपके अच्छे स्वभाव का होना ज़रूरी है । उदाहरण के तौर पर लीजिये- आपके पास ज्ञान का अकूत भंडार है, आत्मविश्वास है, संकल्प शक्ति से सराबोर हैं, मगर यदि आप के पास अच्छा स्वभाव नहीं है तो आपको कदम कदम पर मुसीबत खड़ी मिलेगी  । आपके सफल जीवन में आपके गुरुजन ,शुभचिंतक,मित्रा,साथी,भाई-बहन,किसी न किसी रूप में शरीक होते हैं  । भला अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है क्या ? तो सभी को साथ रख कर आप अपनी सीरत का कुशलतापूर्वक विकास और निर्माण करें । 
एक हंसमुख, ज़िंदादिल व्यक्ति लोकप्रिय होता है अपनी सीरत से, विनम्रता का जामा पहने वो सफलता के सोपान चड़ सकता है । शारीरिक सौंदर्य तो ईश्वर की नेमत है लेकिन सीरत आप खुद बनाते हैं  । आपसी मेलजोल से आपमें गुणात्मक वृद्धि होती है  ।जैसा व्यवहार आप दूसरों से अपने लिए चाहते हैं वैसा व्यवहार दूसरा भी आप से अपेक्षित रखता है  । ये गीत भी तो ऐसी ही कुछ बात कह रहा है न -!
अक्सर हम अपने दोस्त, रिश्तेदार या साथी ढूंढते वक्त ज़हन में शक्लें ही केवल याद रख लें तो क्या होगा ? अगर आप केवल शक्लें ही याद रखेंगे तो आपके निर्णय ग़लत हो सकते हैं । व्यक्ति कि पहचान भले ही चेहरा हो सकता है, पर उस चेहरे कि असली पहचान तो उस व्यक्ति कि सीरत ही होती है । बहुत ज़रूरी हो जाता है जब हम अपने जीवन-साथी का चयन करें तो बहुत सोच-विचार करके ही निर्णय लें । ऐसा इसलिए क्योंकि बहुत संभव है कि सामने वाले कि रुचि, व्यवहार, आदतें, आपके अनुरूप न हों और आप केवल शक्ल या ‘सूरत’ देखकर ही हामी भर दें । किसी का व्यक्तित्व का हिस्सा सूरत तो हो सकती है पर उसके समग्र व्यक्तित्व की पहचान, उसकी सीरत ही होगी  ।
            चेहरे की खूबसूरती कुछ पलों के लिए आकर्षित करती है, लेकिन सीरत की खूबसूरती ज़िंदगी भर के लिए अपना बना लेती है । आपके पास खूबसूरत चेहरा हो या न हो लेकिन, सीरत की खूबसूरती ज़रूर होनी चाहिए ।  सूरत ही अक्सर लोग देखते हैं । सीरत की सुध तब होती है, जब अक्सर देर हो जाती है । सूरत से सब सुलझे- भले लगे पर सीरत किसकी कितनी उलझी क्या पता ? इसी बात पर सुनिए फिल्म डैडी का ये गीत :-
मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना कहा जा सकता है । पर इस रचना में अच्छाइयाँ और कई बुराइयां दोनों छिपी हैं । हें तो मानव चाहे तो अपनी अच्छाइयाँ बढ़ाए या अपनी बुराइयाँ बढ़ाए, भगवान की इस रचना में कोई बहुत सुंदर है तो, कोई इतना भाग्यशाली की घर-धन-धान्य से भरा रहता है तो कोई किस्मत का ऐसा मारा है जो दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाता । पर इन सबसे परे हमें एक बात यह नहीं भूलना चाहिए कि सूरत नहीं सीरत अच्छी होनी चाहिए । किसी कि चिकनी-चुपड़ी बातों में न आकर न खुद पे पैर पर कुल्हाड़ी न मार लेना । सिर्फ दिल कि बात पर न जाना कुछ दिल और व्यवहार, चलो इक काम करते हैं । आज हम खुद से इश्क करते हैं देखते दिल के आईने में अपनी सूरत नहीं सीरत से सँवरते हैं ।
विपरीत पारिस्थितियों में व्यक्ति कि असली पहचान नज़र आ ही जाती है । ऐसी स्थिति में अक्सर लोग दूसरों का संबल और सहारा चाहते हैं तब आप किसी कि सीरत का सही अनुमान लगा सकते हैं । अच्छों से भी हम हमेशा कहते हैं हमेशा अपने दोस्त सोच समझ कर ही चुनो, बालिग होते बच्चों से, किशोरावस्था में चल रहे बच्चों के रुझान और दोस्ती-यारी से घर के बड़े अक्सर तनाव में होते हैं, कि कहीं उनके बच्चों का चयन ग़लत तो नहीं होगा क्योंकि इससे उनकी दिशा और संगत तय होती है । यही नहीं, जीवन में आप के साथ उठने बैठने वालों, आपके रिशतेदारों और मित्रों का आप के स्वभाव पर प्रभाव दिखाई देता है । इसीलिए तो कहा है :
सकारात्मक दृष्टिकोण में वो जज़्बा होता है जैसा दीपक में जो एक लौ से असंख्य दीपक रोशन कर दे ,कहने का अर्थ ये है कि आपके अच्छे विचार और स्वभाव से आप अकेले की  शक्ति समूहिक शक्ति में बदल सकती है, एक ऐसी शक्ति जो मार्ग प्रशस्त करे आपके लक्ष्य को बुलंदियों तक पहुंचा दे  ।
किसी भी व्यक्ति के पारिवारिक, सामाजिक , शैक्षिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और परिस्थिति का उस व्यक्ति के सीरत और चरित्र पर प्रभाव पड़ता है । इन सब का संतुलन सही हो तो सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । सीरत एक व्यापक सोच है हर परेशानी, हर विपरीत परिस्थिति में इसकी परीक्षा ज़रूर होती है, ऐसे में आपका व्यवहार, स्वभाव, आपकी एकाग्रता,सहनशीलता आप के सीरत का परिचय देती है  ।
                                    रुखसती  जब भी इस जहां से हो,
            मेरी सूरत पे, मेरी सीरतें सिकंदर हों ।
दोस्तो ! जल्दी ही फिर मिलेंगे – किसी नए विषय और मधुर गीतों के साथ .... अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिये ।

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© neetika verma नीतिका वर्मा

COVID-19 और लॉक डाउन


लॉक डाउन और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी




जीना मुश्किल है कि आसान जरा देख तो लो ।
लोग लगते हैं परेशान जरा देख तो लो ।
यह नया शहर तो खूब बसाया तुमने
क्यों पुराना हुआ वीरान जरा देख तो लो ॥

सुप्रसिद्ध कवि कुंवर बेचैन की यह पंक्तियां आज कितनी सटीक हैं । दिन पर दिन बढ़ते कोरोना वाइरस संक्रमण के मरीज, हमें सैनिटाइज करते रहने की हिदायत और आइसोलेशन में रहने की जो जिंदगी हमें मिली है वह शायद हम सभी को यह सोचने पर मजबूर कर दे कि हमारा प्रकृति से जुड़कर जीना ही उचित है और इस बात पर हम सर्वसहमत हो सकें । बहरहाल, अब जब घर पर ही रहने की बात कही जा रही है, सोशल गेदरिंग से बचने की बात कही जा रही है, सोशल डिस्टेंसिंग ही हमें सुरक्षित रख पाएगी की बात सिद्ध हो चुकी है तो मानव के सामाजिक प्राणी होने की बात पर शंका होने लगी है । चलिये दोस्तो, ये गीत सुनते हैं :
आज हम घर पर बैठे मनोरंजन के लिए टीवी और मोबाइल को ही अपना साथी बना बैठे हैं । बच्चों ने तय कर लिया है कि वह कार्टून देखेंगे, वीडियो गेम खेलेंगे और टीवी देखते ही समय गुजारेंगे । इसमें कोई बुराई तो नहीं दिखती पर बीच-बीच में यदि आप ब्रेक लेंगे तो आंखों के लिए ठीक होगा । टीवी पर अच्छी फिल्म देखी जा सकती है । टेक्नोलॉजी का यदि उपयोग करना ही है तो मोबाइल या फोन पर अपनों से बातें करें । जिन से आपने काफी समय से बात न की हो उन्हें याद कीजिए । तो उठाइए फोन और डायरेक्टरी । याद कीजिए उन्हें, जिन्हें आप भूल बैठे हैं । आपका यह प्रयास सामने वाले को बेहद खुश कर सकेगा और आपको सुकून मिलेगा, तसल्ली मिलेगी और आपका हृदय गदगद हो जाएगा । फिल्म प्रेम पुजारी में नीरज जी का लिखा ये गीत मन को प्रसन्न कर देगा :   
आपको इन दिनों कई मैसेज और वीडियो मिल रहे होंगे आनन-फानन में इन्हें फॉरवर्ड मत कीजिये असामाजिक और फेक संदेशों से सतर्क रहें । ये बात आप भी मानते होंगे कि संप्रेषण के अभाव में अपनत्व खोता जा रहा है जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि संतोष है इस समय के परिपेक्ष्य में अपने आसपास ही मनोरंजन का साधन आपको ढूँढना चाहिए जन जन की भागीदारी और सहयोग से कोरोना वाइरस संक्रमण से जंग हम जीत सकेंगे ।
कोरोना वाइरस संक्रमण के बढ़ते मरीज और आज के समय पर अनिवार्य रूप से सैनिटाइजेशन करते रहने की बात और आइसोलेट सी जिंदगी हमें कुछ तनाव में ला रही है स्कूल-कॉलेज बंद हो चुके हैं मॉल भीड़भाड़ वाली जगह सुरक्षित नहीं रह गई है ऐसे में घर से केवल जरूरत पड़ने पर ही निकलने की सलाह दी जा रही है। असमय स्कूल बंद हो जाने के कारण बच्चों की मिलीजुली प्रतिक्रिया है एग्जाम के चक्कर से बचने की खुशी तो बाहर घूमने फिरने खेलने की पाबंदी ऐसे में वे क्या करें? बच्चे तो क्या बड़ों के लिए भी यह समस्या है दिनभर टीवी या मोबाइल पर डटे रहे तो स्वास्थ्य पर भी असर पड़ेगा ऐसे में आप कुछ घरेलू खेल खेलकर अपना मनोरंजन कर सकते हैं इसके अलावा जैसे कैरम, लूडो, चौपड़, शतरंज कुछ ऐसे खेल है जिसे खेलने के लिए 2 से 4 लोग भी हो तो आप का खेल रुकेगा नहीं । सुनिए, फिल्म मिस्टर इंडिया में बच्चे किस तरह से अपना मनोरंजन कर रहे हैं :
आज के परिपेक्ष्य में जरूरी है कि कुछ फेरबदल कर अपने शौक और रूचि के अनुसार बदलाव लाएं । आप मेरी बात से सहमत होंगे आज से दो दशक पहले का और उससे भी पहले का रुख कीजिए उस दौर में बच्चे स्कूल से आते थे भोजन करते थे और फिर टोलियों में पार्क में, मैदान में, या फिर गली में ही खेलते थे । संझा होते हैं घर को लौटते थे पढ़ते थे और घर पर बने भोजन को बड़े चाव से खाया करते थे, उस दौर में माता-पिता अपने बच्चों के शारीरिक विकास को लेकर चिंतित नहीं हुआ करते थे । पर टेक्नोलॉजी के बदलते हैं जीवन में बड़ा बदलाव आया बच्चे खेल के मैदान में कम और टेक्नोलॉजी पर बेस खेल पर  ज्यादा ध्यान देते  हैं,  ऐसे में मोटापा और शारीरिक क्षमता पर असर पड़ा है। आज यदि घर पर रहना जरूरी हो गया है जब हम बाहर खेलकूद नहीं कर सकते हैं तो फिर ऐसे में नियमित रूप से दोनों वक्त यानि सुबह-शाम आपको योगा करना चाहिए और भोजन आप सादा सात्विक करें और सुनें फिल्म सूरमा का ये गीत :
गुजरा जमाना ऐसा नहीं बीता जिसे आप दोहरा न सके इसके अलावा घर के बड़ों से जरूरी सलाह ने माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी से किस्से कहानियां जरूर सुने । ऐसा आज से दो दशक और उससे भी पहले हुआ करता था घर के बड़े किस्से कहानियां हमें सुनाते थे जिससे कि आज की जनरेशन दूर है समय का टोटा सभी के लिए एक जुमला सा है भागमभाग की जिंदगी में ऐसे में बहुत कुछ करने की इच्छा करने वालों के लिए अभी जो समय मिला है उसमें वह भी अपनी अभिरुचि पूरी कर सकते हैं।  आप बिना किसी संकोच के अपने अभिरुचि को समय दीजिए वह सुरक्षित हो कोरोना वाइरस संक्रमण से और वह घर पर ही रह कर कर सके।  लेखन और पढ़ाई का अच्छा समय है किचन गार्डन या बगीचे में समय लगा सकते हैं , बच्चे भी अपने बड़ों की अनुमति से फायर लेस कुकिंग कर समय बिता सकते हैं।  रोज की दिनचर्या के अलावा यदि घर के कामों को सभी मिल बाँट कर करें तो आप सभी का समय अच्छा व्यतीत होगा । सुनिए फिल्म मिस्टर नटवारलाल में अमिताभ बच्चन जी के द्वारा सुनाई गई ये कहानी :
बच्चे बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट यानी कबाड़ से जुगाड़ कर उपयोगी वस्तु बना सकते हैं यहाँ फिर वही बात कहेंगे का पूरा पूरा ध्यान रखें कोरोना वाइरस संक्रमण से बचने की सारी सावधानियां रखें । आप रुचि रखते  हो तो  सिलाई,कढ़ाई, बुनाई भी सीखी जा सकती है । यदि पेंटिंग करने के शौकीन है तो हाथ इन दिनों आजमा ही लीजिएगा । आप दिमागी कसरत भी कर सकते हैं आप मेडिटेशन करके अपने मन को शांत रखें, वर्ग पहेली भरिए इसके अलावा यदि संयुक्त परिवार में आप रहते हैं तो अंताक्षरी या फिर प्रश्नोत्तरी का खेल कैसा रहेगा ऐसे में तंबोला खेल कर भी आप अपना अच्छा समय व्यतीत कर सकते हैं जैसे मैंने प्यार किया फिल्म में इन लोगों ने किया :
रेडियो को आप यदि मनोरंजन के लिए चुनते हैं तो आप सूचना शिक्षा और मनोरंजन तीनों के करीब होंगे । टीवी पर समाचार और मनोरंजन के लिए आप को चैनल बदलना पड़ता है । तो हुई न सोने पर सुहागे वाली बात बिना रुकावट के आप सुनते रहिए और काम करते जाइए ।
होकर मायूस न यूं शाम से ढलते रहिए । 
जिंदगी भोर है सूरज से चढ़ते रहिए । 
एक ही ठाँव पर ठहरेंगे तो थक जाएंगे-
धीरे ही सही राह पर चलते रहिए ।

तो दोस्तो ! लॉक डाउन का सदुपयोग कीजिये, घर में अपनों के साथ रहिए और वो सब तलाश कीजिए जो जीवन की आपाधापी में पीछे कहीं छूट गया है । अपना ख्याल रखिए, अपनों का ख्याल रखिए । जल्दी ही फिर मिलेंगे ।

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* सभी गीतों की लिंक youtube से साभार ली गई है । 
© neetika verma नीतिका वर्मा
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