Monday, April 6, 2020

दर्पण झूठ नहीं बोलता

दर्पण झूठ नहीं बोलता             

मित्रो, वरिष्ठ कवि डॉ कुँवर बेचैन का नाम आप सबने सुना होगा । आइए, उनकी एक बेहतरीन कविता के साथ आज का सफर शुरू करें :
                        अपनी सियाह पीठ छुपाता है आईना ।
                        सबको हमारे दाग दिखाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        इसका न कोई दीन, न ईमान, न धरम –
                        इस हाथ से उस हाथ में जाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        खाई ज़रा सी चोट तो टुकड़ों में बंट गया
                        हमको भी अपनी शक्ल में लाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        हम टूट भी गए तो ये बोला न एक बार
                        जब खुद गिरा तो शोर मचाता है आईना ।
                                                                                                                         
                        हर पल नहा रहा है हमारे ही खून से-
                        पानी से अब कहाँ ये नहाता है आईना ?
                                                                                                                         
                        सजने के वक़्त भी ये हमें दे गया खरोंच-
                        बस नाम का ही भाग्य विधाता है आईना ।

दिन भर में जिन जरूरी वस्तुओं का हम उपयोग करते हैं उनमें से एक दर्पण भी है । सुबह उठने से रात सोने तक हम कई बार दर्पण में अपनी सूरत निहार ही लेते हैं, और कई लोग होते हैं जो दर्पण के सामने खड़े होकर कोई अभ्यास करते हैं और इसका महत्व समझते हैं । इसे जरा जिंदगी से जोड़ कर देखिए । दर्पण सिर्फ दिखाता है या बताता है उसके आगे और बाद ठीक करने की ज़िम्मेदारी हम निभाते हैं । दर्पण का वैसे सबसे ज्यादा इशारा सूरत पर होता है कि आप कितना सज-संवरकर सहज महसूस करेंगे । स्त्रियों में सजने-सँवरने के लिए दर्पण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । उनका श्रृंगार दर्पण बिना अधूरा ही होता है । फिल्म उपासना में इंदीवर की कलम से निकले और मुकेश की पुरकशिश आवाज़ में यह गीत यही कुछ तो कह रहा है :   

            वैसे दर्पण यदि बड़े नाप का हो  तो आपके पहने लिबास के साथ आपको तैयार दिखाने में मददगार साबित होता है , और एक बात, जिसे हम सब देख नजर अंदाज करने की कोशिश करते हैं, छुपाने की कोशिश करते हैं या फिर ‘जाने दो’ वाले आलम में दर्पण को अलविदा कह कर मुड़ जाते हैं; वह है आपके शरीर की बनावट जो बेडौल हो तो आप उस ओर ध्यान ही नहीं देना चाहते । मशहूर शायर कृष्ण बिहारी “नूर” फरमाते हैं :
                        “आईना यह तो बताता है कि मैं क्या हूं मगर
                        आईना इस पर है खामोश की क्या है मुझ में ?”
गीत गाता चल फिल्म में ये गीत भी ऐसा ही कुछ कह रहा है :

            क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि दर्पण आपका एक गुप्त साथी भी है जो आपको आपकी सच्चाई दिखाता है । आपका अभ्यास करवाता है, आपको अक्स दिखाकर समझाइश देता है । उदाहरण के लिए देखिए यदि आपको उच्चारण का अभ्यास करना हो तो दर्पण के सामने आप पूरी तरह खुल कर बोलिए । वह आप पर कभी नहीं हंसेगा । हम अक्सर एकांत में ही दर्पण देखना पसंद करते हैं इसका कारण शायद यही है कि हम खुलकर दर्पण के सामने एकांत में उससे बात कर लेते हैं अपने मन की बात कह लेते हैं । आईने के सामने हम अपने अतीत को खोजने लगते हैं :  

            दर्पण की खासियत देखिए ना जो भी उसके सामने आता है जैसा भी चला आता है ,वह उसका सहर्ष स्वागत करता है बिना किसी भेदभाव के, सभी के लिए समान भाव होता है दर्पण में, लेकिन किसी का अक्स वह छुपा कर नहीं रख सकता आप दर्पण से दूर हुए आपकी छवि भी ओझल हो जाती है।  यह क्षणभंगुर सा  स्वभाव दर्पण का कितना निश्चल कितना अपना सा लगता है हर व्यक्ति को अपने आप से प्रेम होता है अपने विचार, व्यवहार, शक्ल पर नाज होता है और वह अपने आप को उत्तम समझता है, दूसरों में कमी ढूंढता है यह मानव स्वभाव है । ऐसे में यदि दर्पण का सभी का मुख हो जाए तो जहां भी आप देखेंगे आप ही आप नजर आएंगे । मेरे कहने का अर्थ यह है कि क्यों ना हम सारे पहन ले आईने सारे देखेंगे अपना ही चेहरा सबको सारे हंसी लगेंगे यहां ।

            आईना की बड़ी खासियत है कि यह नेगेटिव और पॉजिटिव एनर्जी दोनों को अपनी ओर खींचता है लेकिन ठीक इसी तरह यह दोनों पॉजिटिव और नेगेटिव को रिफ्लैक्ट कर देता है मतलब यह आईने के सामने जैसे नजर जाएगी वह वैसे ही एनर्जी रिफ्लक्स करेगा । यही कारण है कि वास्तु दोष दूर करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है इसका प्रयोग इमारतों, घरों ,होटलों ,दुकानों में बड़े पैमाने पर किया जाता है सजावट के तौर पर, रोशनी के लिए चमकदार रिफ्लेक्शन के लिए, कोई चीज बड़ी दिखाने के लिए, सजावट के लिए, पर हां, इसकी अपनी कोई रोशनी नहीं होती इसके परावर्तन के लिए रोशनी के स्रोत की आवश्यकता जरूर पड़ती है । ये गीत भी कुछ कह रहा है :  

जरा सोचिए कांच का आविष्कार कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हमारी जिंदगी में । भले ही आज एलईडी का जमाना है । यदि कांच ना बनता तो पहले साधारण बल्ब और ट्यूबलाइट इस कांच के बगैर अधूरे होते ,बेकार होते ।  यदि कांच ना होता तो दर्पण कैसे अस्तित्व में आता ? नजर से कमजोर लोगों का क्या होता ? विभिन्न प्रकार के लेंस ना बन पाते तो क्या होता ? पारदर्शी वस्तु के निर्माण जैसे की खिड़की के कांच रोशनदान का क्या होता ? टीवी कंप्यूटर आपके मोबाइल का क्या होता जिसके बिना एक पल भी नहीं रहना चाहते । यदि शीशा टूटा तो किरचा  किरचा  इसका घाव  करेगा । फिल्म आशा के इस गीत को सुन कर ऐसा ही तो महसूस होता है  :
            विज्ञान की साधारण भाषा में दर्पण एक प्रकाश युक्ति है जो प्रकाश के परावर्तन के सिद्धांत पर काम करती है । इसका प्रयोग हम मुख्यतः अपनी छवि देखने के लिए करते हैं । इसके अलावा प्रकाश यंत्र, दूरदर्शी यंत्र या फिर सूक्ष्मदर्शी यंत्र के रूप में भी करते हैं और या फिर प्रकाश को एक बिंदु पर केंद्रित करने के लिए भी करते हैं । कैलिफोर्निया निवासी हिन्दी कवयित्री अर्चना पांडा (kavitaprayas.blogspot.com)  ने क्या खूब कहा है :  
                        प्रेम प्यार की समझ ना मुझको पूर्ण समर्पण हूं मैं ।
                        तू जो चाहे वही दिखाऊँ ऐसा दर्पण हूं मैं ।
इसी ज़मीन पर किसी शायर ने ये भी कह दिया है :
                        आईना कुछ नहीं नजर का धोखा है ।
                        नजर वही आता है जो दिल में होता है ।
फिल्म आरोप का ये गीत सुनिए :

            राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता की पंक्तियां हैं
                        जा रही देवता से मिलने तो इतनी कृपा किए जाओ ,
                        अपने फूलों की डाली में दर्पण यह एक लिए जाओ ,
                        आरती फूल से प्रसन्न जैसे हो पहले कर लेना,
                        जब हाल धरित्री का पूछे सम्मुख दर्पण रख  देना
            कहते हैं आईना सच बोलता है, वह दिखाता है जो होता है क्योंकि दर्पण झूठ नहीं सच बोलता है । किसी शायर ने कहा है :
                        किरदार अपना पहले बनाने की बात कर, ।  
                        फिर आईना किसी को बनाने की बात कर ।  
फिल्म नई उम्र की नई फसल का ये गीत कुछ कह जाता है :

            दर्पण का वैज्ञानिक प्रयोग कितना कारगर है, इसका अंदाजा साधारण व्यक्ति शायद पूरी तरह नहीं लगा सकता पर ,फिर भी निजी जिंदगी में सोलर कुकर जो हम इस्तेमाल करते हैं या फिर माइक्रोस्कोप जो इस्तेमाल किया जाता है और सबसे अहम ड्राइविंग में जो हम इस्तेमाल करते हैं इन सब का आपको तो अंदाज़ा  होगा ना ? समुद्री यात्रा हो, पर्वतारोहण करना हो तो इस दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले दूरबीन  कितने जरूरी हैं आप जानते ही हैं । तो दर्पण का प्रयोग दैनिक जीवन में केवल सूरत देखने में नहीं बल्कि कई उपयोग में होता है । फिल्म जीवन धारा का यह गीत एक संदेश देता है :  

            दर्पण की बात है तो उस भौतिक दर्पण के अलावा एक और दर्पण की बात आपसे जरूर करेंगे जो आपके अपने शुभचिंतक आप को दिखाना चाहते हैं, जिसकी ओर वह संकेत देते हैं और वह आप पर निर्भर करता है कि वह इशारा आप समझ कर कैसे सही बन पाते हैं ? यह शुभचिंतक आपके अपने गुरुजन हो सकते हैं , मित्र हो सकते हैं , माता-पिता या कोई भी हो सकता है , जीवन रूपी दर्पण आपके व्यक्तित्व का निखार बढ़ा सकते हैं, वह माद्दा रखते हैं जो आपके व्यक्तित्व के साथ भूमिका को भी बदल दे । ख़ुमार बाराबंकवी कहते हैं :
                                    दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए ।
                                    सामने आइना रख लिया कीजिए ।
आइये ! अपने किरदार को आईने जैसा साफ और बेदाग बनाएँ । फिल्म काजल का ये गीत आप सभी पाठकों को समर्पित है :

            जल्दी ही फिर मिलते हैं – नए विषय और मधुर गीतों के साथ -! नमस्कार ।
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© neetika verma नीतिका वर्मा
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